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Dr S K Joshi's
Ulooktimes
Something which is not aired anywhere
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2.6/ 5
Updated
3 Years Ago
Blog by Dr S K Joshi
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लम्बी खींचने वालों की छोड़ ‘उलूक’ तुझे अपने कुर्ते को खुद ही खींच कर खुद का खुद ही ढकना है
Updated 6 Years Ago
By
Dr S K Joshi
देखी सुनी आस पास की कविता नहीं कहानी नहीं बस बकवास
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लम्हे
दिसम्बर ने दौड़ना शुरु कर दिया तेजी से बस जल्दी ही साल की बरसी मनायी जायेगी
रोज ही पढ़ने आता है साहिब नापागल लिखा पागल ‘उलूक’ का समझ में नहीं आता है कहता फिरता है किसी से कुछ पूछ क्यों नहीं लेता होगा
गिरोहबाज गिरोहबाजी सब बहुत अच्छे हैं हाँ कहीं भी नहीं होना कुछ अलग बात है
पुर्नस्थापितं भव
क से कुत्ता डी से डोग भौँकना दोनों का एक सा ‘उलूक’ रात की नींद में सुबह का अन्दाज लगाये कैसे
किसने कह दिया ‘उलूक’ कि पागलों को प्रयोग करने के लिये मना किया जाता है
पता ही नहीं चलता है कि बिकवा कोई और रहा है कुछ अपना और गालियाँ मैं खा रहा हूँ
थोड़े से शब्दों से पहचान हो जाना, बहुत बुरा होता है ‘उलूक’, कवि की पहचान हो कर बदनाम हो जाना
लिखा हुआ रंगीन भी होता है रंगहीन भी होता है बस देखने वाली आँखों को पता होता है
जरूरी होता है निकालना आक्रोश बाहर खुद को अगर कोई यूँ ही काटने को चला आता है
खाजा को खाजा क्यों कहते हैं पूछ कर राजा से ध्यान भटकाते हैं
क्यों कह देता होगा कुछ भी लिखे को कविता कोई कवि नहीं करते बकबक लिखते हैं दिमाग पर लगा कर जोर
परिभाषायें बदल देनी चाहिये अब चोर को शरीफ कह कर एक ईमानदार को लात देनी चाहिये
समझ में नहीं आ रही है ऊँचाई एक बहुत ऊँची सोच की किसी से खिंचवा के ऊँची करवा ही क्यों नहीं ले रहा है
धरम बिना आवाज का कैसा होता है रे तेरा कैसे बिना शोर करे तू धार्मिक हो जाता है
फुरसत की फितरत में ही नहीं होती है फुरसत फितरत और फुरसत से साहित्य भी नहीं बनता है
पागलों को पागल बनाइये आदमी बने कोई इससे पहले इंसानियत कूएं में रख कर आइये
फिर से एक नया साल बापू एक और दो अक्टूबर बीत गया
निशान किये कराये के कहीं दिखाये नहीं जाते हैं
बेकार की ताकत फालतू में लगाकर रोने के लिये यहाँ ना आयें
श्रद्धांजलि डाo शमशेर सिंह बिष्ट
चूहों से बचाने के लिये बहुत कुछ को थोड़े कुछ को कुछ चूहों पर दाँव पर लगाना ही होता है
तू समझ तू मत समझ राम समझ रहे हैं उनकी किसलिये और क्यों अब कहीं भी नहीं चल पा री
कितनी छलक गयी कितनी जमा हुई बूँदें बारिश की कुछ गिनी गयी कुछ गिनते गिनते भी यूँ ही कहीं और ही रह गयी
'उलूक’ तखल्लुस है कवि नहीं है कविता लिखने नहीं आता है जो उसे समझ में नहीं आता है बस उसे बेसुरा गाना शुरु हो जाता है
कबूतर का जोड़ा कबूतर पकड़ना कबूतर उड़ाना सिखाने को फिर से सुना है नजर आना शुरु हो जायेगा
चिट्ठागिरी करने का भी उसूल होता है लिखना लिखाना कहाँ बेफजूल होता है
लिखना जरूरी हो जा रहा होता है जब किसी के गुड़ रह जाने और किसी के शक्कर हो जाने का जमाना याद आ रहा होता है
कुछ बरसें कुछ बरसात करें बात सुनें और बात सुनायें बातों की बस बात करें
देश बहुत बड़ी चीज है खुद के आस पास देख ‘कबूतर’ ‘साँप’ ही खुद एक ‘नेवला’ जहाँ पाल रहा होता है
गिरफ्तारी सजा जेल बीमे की भी जरूरत महसूस होने लगी है आज फितूरी ‘उलूक’ की एक और सुनिये बकवास
पोस्टमैन को फिर से कभी घर पर बुलवायें चिट्ठे छोड़ें चिट्ठियाँ पढ़े और पढ़वायें
फीड बैक का मतलब प्रतिक्रिया दिया जाता है जिसमें लेकिन मजा नहीं आता है फीड बैक से जैसे सब कुछ पता चल जाता है
खुदा भगवान के साथ बैठा गले मिल कर कहीं किसी गली के कोने में रो रहा होता दिन आज का खुदा ना खास्ता अगर गुजरा कल हो रहा होता
बहुत खुश है गली के नुक्कड़ पर आजादी के दिन आजाद बाँटने के लिये खुशी के पकौड़े तल रहा है
पट्टे के रंग के जादू में किसलिये फंसना चाह रहा है बता कहीं दिखा कोई उल्लू जो रंगीन पट्टा पहन कर किसी गुलिस्ताँ को उजाड़ने जा रहा है
आग पर लिखले कुछ भी जलता हुआ इससे पहले कह दे कोई सुन जरा सा अब कुछ बची हुयी राख पर लिख
रोटियाँ हैं खाने और खिलाने की नहीं हैं कुछ रोटियाँ बस खेलने खिलाने के लिये हैं
गुलामी आजाद कर रहे हैं ये तो मनमानी है आओ किसी की पाली हुयी एक ढोर हो जायें
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