वहम
बहुत सर्द थी कल की रात... ख़्यालात भी रजाई में जैसे सिकुड़ से रहें थे... कोई दस्त...
10 Years Ago
अन्नदाता के लिए कुछ अक्षर
काली बदरियों को सूँझी फिर से शरारत छप्पर गरीब का रात भर आँसू बहाता रहा रोता ...
10 Years Ago
अब वो बेफिक्र सुबहें नहीं होती, अब वो रंगीन शामें नहीं होतीं...
मार्बल बिछ गया है अब घर के चबूतरे पर बारिश पड़ भी जाए तो मिटटी की ख्श्बू नहीं आ...
10 Years Ago
दो पल मुझे सुकूँ के मिले...
रात की गुमशुम सी खामोशियों में पलकों की दहलीज़ पे बैठे कुछ झूठे ख्वाब नींद क...
10 Years Ago
तुम जा रही थी
शाम को कमरे के रोशनदान से झाँक के देखा शायद तुम मेरी गली से गुजर रही थी... च...
10 Years Ago
ट्विटर के गलियारे से.…
इस पोस्ट के द्वारा ट्विटर पे लिखे गए अपने कुछ सूक्ष्म-काव्य आप लोगो के साथ सा...
10 Years Ago