पद्म सिंह 's Padmavali

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धूप …

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सवेरे ही शाम का मज़मून गढ़ जाती है धूप एक सफ़हा ज़िन्दगी का रोज़ पढ़ जाती है धूप लाँघती परती तपाती खेत, घर ,जंगल, शहर धड़धड़ाती रेल सी आती है बढ़ जाती है धूप मुंहलगी इतनी कि पल भर साथ रह कर देखिये पाँव छू,…
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