नन्ही आँखों की ओझल छाया में खोता बचपन, कभी धूल, तो कभी भूख की आग में सूखता बचपन. छोटे छोटे हाथों में खिलोने के बजाए भीक का तोहफा आया, गालियों की मार ने, न जाने कितनी बार उसके मासूम मन को देहलाया. दिन के शोर, तो कभी रात के सन्नाटे में तड़पता बचपन, कभी बरसात, तो कभी सर्दी में ठिठुरता …
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