मानूस हर्फ़ - तख़लीक़-ए-नज़र
शाम उतर रही थी, मैं सोफ़े पे लेटा अपने सफ़र की थकान उतार रहा था… हाँ, उसी शाम उसका...
11 Years Ago
रिश्ते - तख़लीक़-ए-नज़र
कुछ रिश्ते वक़्त की आँच पर धीरे-धीरे तपकर एक दिन राख हो जाते हैं फ़ना हो जाते है...
11 Years Ago
रोना था इसलिए मिला मैं तुझे - तख़लीक़-ए-नज़र
सावन बदल गया, मुआ टल गया घोर अंधेरा था, दिया जल गया बातें तेरी… भूल जाऊँ दिलाँ...
11 Years Ago