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मिर्ज़ा ग़ालिब की शमा की तरह कुलदीप नैयर हर लौ में तपे हैं, हर रंग में जले हैं. शमा के जलने में उनका यक़ीन इतना गहरा था कि 15 अगस्त से पहले की शाम वाघा बॉर्डर पर मोमबत्तियां जलाने पहुंच जाते थे. उस सहर के इंतज़ार में, जिसे शमा के हर रंग में जल जाने के बाद आना ही है. कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा 'Beyond the Lines' में लिखा है कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच नफ़रतों और दुश्मनी का समंदर फैला दिखता है, मगर मोहब्बत की लौ जलेगी, यह उम्मीद भी दिखती रहती है. एक दिन दक्षिण एशिया के लोग शांति, सदभाव और सहयोग को समझेंगे. हम होंगे कामयाब, एक दिन.