मेरी सेवा शुरू करने की इब्ने सईद साहब तो जैसे इंतजार में बैठे थे कि कोई व्यक्ति मिले जो उर्दू-हिन्दी जानकार हो। मैं जब पहुंचा तो कुछ देर की बात के बाद इस ‘कुन्दए ना तराश’ को उन्होंने अपनी बातचीत में परख लिया था। उन्होंने मुझे गाइड किया कि वे बोलेंगे और मुझे आम जुबान हिन्दी में मुश्किल उर्दू अल्फाजों को हिन्दी में ढालते हुए लिखते जाना है। मैं तैयार। उन्होंने कुर्सी की पुश्त से टिक, आंखों बंद कर, ख्यालातों के गोते लगाते हुए तिलिस्म कथा को बोलना (डिक्टेट करना) शुरू किया। मेरे बीच तय हुआ थाकि मैं धीरे से कहूंगा ‘हूं’ जिसका आशय होगा उनका बोला हुआ लिख चुका हूं। वे उसके आगे का फसाना बोलना शुरू करेंगे और मैं लिखना।
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